पापी पेट का सवाल है : मित्रपुरा कस्बे के मुख्य बाजार में रस्सी पर अपने करबत दिखाती 9 साल की मासूम- कहां गये जिम्मेदार

- साहब, मजबूरी है पापी पेट रस्सी पर चलाता है, बाबूजी फेको ना पैसा, पापी पेट का सवाल है! 
-क्या समाज कल्याण विभाग नींद में है!
-चाइल्ड पर काम करने वाले एनजीओ भी है, वे क्या कर रहे हैं, सरे बाजार बालिका पर अत्याचार छोटी बात नहीं 
 
There is a question of sinful stomach: 9 year old innocent showing her grace on a rope in the main market of Mitrapura town - where did she go responsible
एक 9 साल की मासूम बालिका पापी पेट के लिए रस्सी पर चलकर तमाशा दिखाती रही और लोग तमाशबीन बनकर देखते रहे! कुछ लोग पैसे फेंक कर मनोरंजन करते रहे और बालिका मासूम चेहरे के साथ तो तुतलाती जबान से कहती रही बाबूजी फेको ना पैसा, पापी पेट का सवाल है, लेकिन इसके पापी पेट व परिजनों की मजबूरी को भला कौन समझता, उसको समझने के लिए जिले के ना तो जिम्मेदार अधिकारी आगे आए, ना वह संस्थाएं जो बड़ा अनुदान उठाती हैं, जबकि उस बालिका को किसी अच्छे स्कूल में होना चाहिए था। यह हमारे भारत का सुनहरा भविष्य है उसको संभालना और संवारना हम सबकी जिम्मेदारी है।

सवाई माधोपुर/मित्रपुरा, (राकेश चौधरी)। खुशी से कब कोई मासूम यह करतब दिखाता है। यह मजबूरी है, पापी पेट रस्सी पर चलाता है (Sinner belly runs on rope)। बाबूजी फेको ना पैसा (Babuji feko na paisa), पापी पेट का सवाल है? (Have a stomach problem?) ऐसा ही नजारा मित्रपुरा तहसील कस्बे में तेजा दशमी पर लगने वाले मेले दिखाई दिया, जो जिंदगी दांव पर लगाकर 9 साल की यह बच्ची परिवार का पेट भरने की जुगत में दिखी।

इंसानियत जताने वाले उसे नोट देकर फर्ज पूरा करते नजर आए। रस्सी पर साइकिल की रिंग और उस पर बैलेंस, सबको दांतों तले उंगली दबाने को मजबूर कर रहा था। सवाल एक नहीं, सबके मन में हजारों एक साथ उठ रहे थे। 9 साल की मासूम को देखकर हर कोई ठिठक गया था ऐसे खेल पहले होते थे। अब तो हमारा देश और सरकार बालिकाओं के प्रति काफी जागरूक है। फिर कोई क्यों नहीं बोला? जब 9 साल की बच्ची साइकिल की रिंग पर बैलेंस बनाकर इस पार से उस पार हो रही थी। बैलेंस के लिए हाथ में बांस भी था। नीचे माँ- लोगों से तालियाँ बजवा रही थी। बच्ची पैसे फेंकने की अपील कर रही थी। खुशी से यह सब कौन करता है? यह तो पापी पेट का सवाल था।

बच्ची को ट्रेंड कर परिजनों ने ऐसा करने पर मजबूर कर दिया। उसे तो केवल यह आभास है कि लोग पैसा देंगे ओर उसके परिवार का पेट भरेगा। 9 साल की मासूम को स्कूल में होना चाहिए। उसके हाथ में कलम व किताब होनी चाहिए। परिजन कैसे उसके पसीने की कमाई खाने लगे? ऐसी कौन सी मजबूरी माँ-बाप की रही होगी कि इतनी मासूम को ट्रेंड कर उसकी जिंदगी खतरे में डाल दी?

प्रशासन की है जिमेदारी? 
प्रशासन का क्यों नहीं है अभी भी ऐसे बच्चों पर ध्यान, क्या समाज कल्याण विभाग नींद में है। चाइल्ड पर काम करने वाले जिले व हर तहसील में दर्जनभर एनजीओ हैं। वे क्या कर रहे है? सरे बाजार इस तरह के बालिकाओं पर अत्याचार छोटी बात नहीं है?। भले परिजनों का पेट भर रहा हो। लेकिन बच्ची को जरिया बनाकर ऐसा करवाना भी बाल अपराध या अत्याचार की श्रेणी में आता है।

बचपन हर गम से अंजाना होता है, लेकिन गरीबी की मार बहुत सारे बच्चों को छोटी उम्र में ही दो जून की रोटी कमाने के लिए ऐसे काम करने को मजबूर कर देती है जिसे देखकर हम और आप हैरत में पड़ जाते हैं। सड़क के किनारे अकसर छोटे मासूम बच्चे जिस तरह के कारनामे दिखाते मिल जाते हैं।