Rajasthan: बजरी लीज होल्डर्स, ट्रक ऑपरेटर्स के बीच अधिक मुनाफा कमाने की होड़ में लोगों को उठाना पड़ रहा महंगाई का बोझ

 
In the race to earn more profit among gravel lease holders, truck operators, people are facing the burden of inflation.

टोंक/पीपलू,(शिवराज बारवाल/ओपी शर्मा)। हाल ही में राज्य सरकार के खनिज विभाग ने आमजन को बजरी सस्ती दरों पर उपलब्ध (Gravel available at affordable rates) कराने की दृष्टि से पूर्व में बजरी लीज की संख्या 12 से बढ़ाकर 28 (Increase the number of gravel leases from 12 to 28) की है। ताकि लोगों को उनकी मांग के मुताबिक सस्ती बजरी उपलब्ध हो सके। साथ ही बजरी ईलाको से समीप ही सस्ती दर से बजरी मिल सकें। लेकिन उसके बावजूद भी बजरी की दरें कम नहीं (gravel rates not low) हो पा रही हैं। बजरी लीज धारक एवं ट्रक ऑपरेटर्स दोनों ही बजरी की दरें कम करने के मूड में नही है। दोनों की जिद के कारण आम लोगों को महंगी दरों से बजरी खरीदने को विवश होना पड़ रहा है। 

उल्लेखनीय रहे कि दोनों के बीच दरों को लेकर सीधा-सीधा अब खनिज विभाग का हस्तक्षेप नहीं होने से मनमानी की जा रही है। खनिज विभाग ने लीज देने के बाद इस मामले में कोई रेट कंट्रोल नीति नहीं होने के कारण आज भी लोगों के लिए मकान बनाना महंगा सौदा साबित हो रहा है।

वहीं दूसरी तरफ ऑल राजस्थान बजरी ट्रक ऑपरेटर्स वेलफेयर सोसायटी के अध्यक्ष नवीन शर्मा का कहना है कि बजरी लीज होल्डर्स अधिक लाभ लेने के लिए बजरी के दाम नहीं घटा रहे हैं। जिनका कहना है कि खनिज विभाग की तरफ से बजरी लीज होल्डर्स के लिए दरें तय करने का कोई नियंत्रण नही है, जिस कारण ये उपभोक्ताओं की जेब से मनमानी राशि वसूलने में लगे है। वहीं नवीन शर्मा ने बताया कि यदि जीएसटी एवं डेड रंेट आदि खर्चे को निकालने के बाद बजरी प्रति टन 200 रूपए की पड़ती है, लेकिन ट्रक ऑपरेटर्स से 700 रूपयों की वसूली की जा रही है। ऐसे हालातों में आमजन को बजरी की दरों में कोई राहत नहीं मिल रही हैं। 

बजरी ट्रक ऑपरेटर्स वेलफेयर सोसायटी के अध्यक्ष नवीन शर्मा ने सीधे सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि कोर्ट की दुहाई देते हुए बजरी लीज धारकों को फ्री हैण्ड कर रखा है। शर्मा ने कहा कि ट्रक ऑपरेटर्स को 700 रूपए प्रति टन बजरी दी जा रही है, जबकि खींच करके टेक्स वगैराह मिलाकर के बजरी लीज होल्डर्स का खर्चा 200 रूपए आता है। उनका कहना है कि ट्रक ऑपरेटर्स का ट्रांसपोर्ट का छह सौ रूपए का ख़र्चा हो जाता है। वहीं ट्रक ऑपरेटर्स 50 लाख रूपए की गाड़ी रोड पर चलाता है, जिसकी सवा -डेढ़ लाख की प्रति महीने किश्त भी चुकानी पड़ती है तथा टायर भी घिसते है, टेक्स भी देना पड़ता है। इतना ही नहीं ड्राईवर की तनख्वाह भी चुकानी पड़ती है तो कम से कम ट्रक ऑपरेटर्स को 5-6 हजार रूपये का लाभ भी होना चाहिए। 

उन्होंने इस मामले में कहा कि सरकार को पहले की तरह बजरी की दरें स्थाई निर्धारित करनी चाहिए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट स्टे की दुहाई देते हुए मामले को लटका रखा है। शर्मा ने इस मामले में बजरी लीज होल्डर्स एवं सरकार के बीच सांठगांठ का आरोप लगाते हुए कहा कि सात साल से सरकार स्टे को क्यों नहीं तुड़वा पाई, एक कागज तक भी नहीं चलाया। बजरी लीज होल्डर्स एवं ट्रक ऑपरेटर्स के बीच अधिक मुनाफा कमाने की होड़ में अब साधारण व्यक्ति को भी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।